I’m a _________, ________ and _________ (list three things that describe you, e.g. small business owner, writer, cat lover, devoted father) from __________ (list the general area you live in, e.g. country, state or city, but don’t ever give your address). I’m here writing my Myspace About Me section because ____________ (your reason for signing up on MySpace).
The things I love most in life are ______, _________ and ________ (list your favorite things, e.g. hanging with friends, scrapbooking, photography, cycling, family, my kids). I’ve been ___________ (one of your hobbies) for ____ years, and I really love it.
On week days you’ll usually find me ____________ (something that describes you at work or school, e.g. working as a landscaper, pretending to pay attention in school, looking after my kids, at the library, teaching kindergarten kids). On the weekends I like to ________ and ________.
My idea of the perfect day would start with _________. And then I’d _______. Later I’d __________. And I’d top it all off by ________.
The kinds of people I enjoy the most are ones who are ________ and ________. That’s important to me because __________.
My dreams for the future are ________, _________ and _________. So what am I doing to achieve those dreams? Well, how about ____________, for starters. And also, ______________. One thing I need to do more of is ___________.
Thursday, April 28, 2011
Wednesday, March 2, 2011
Love's blindness
Now do I know that Love is blind, for I
Can see no beauty on this beauteous earth,
No life, no light, no hopefulness, no mirth,
Pleasure nor purpose, when thou art not nigh.
Thy absence exiles sunshine from the sky,
Seres Spring's maturity, checks Summer's birth,
Leaves linnet's pipe as sad as plover's cry,
And makes me in abundance find but dearth.
But when thy feet flutter the dark, and thou
With orient eyes dawnest on my distress,
Suddenly sings a bird on every bough,
The heavens expand, the earth grows less and less,
The ground is buoyant as the ether now,
And all looks lovely in thy loveliness.
BY - ALFRED AUSTIN
Can see no beauty on this beauteous earth,
No life, no light, no hopefulness, no mirth,
Pleasure nor purpose, when thou art not nigh.
Thy absence exiles sunshine from the sky,
Seres Spring's maturity, checks Summer's birth,
Leaves linnet's pipe as sad as plover's cry,
And makes me in abundance find but dearth.
But when thy feet flutter the dark, and thou
With orient eyes dawnest on my distress,
Suddenly sings a bird on every bough,
The heavens expand, the earth grows less and less,
The ground is buoyant as the ether now,
And all looks lovely in thy loveliness.
BY - ALFRED AUSTIN
Thursday, February 10, 2011
दिल्ली का एक और दर्द
अगर हम दिल्ली की बात करते हैं तो सबसे पहले क्या तस्वीर हमारी हमारी आंखों में उभर कर आती है
वही बड़े बड़े मॉल्स चिकनी सपाट सड़कें फ्लाईओवर फ्लाईओवर के ऊपर फ्लाईओवर मैट्रो रेल क्नौट प्लेस इंडिया गेट संसद भवन राष्ट्रपति भवन न जाने क्या क्या हमारे सामने मण्डराने लगता है।
लेकिन हम में से कितने लोग हैं जो दिल्ली के गावों को भी जानते हैं
दिल्ली में गांव कैसे हो सकते कुछ लोग तो यह भी सोचते होंगे
जी हां जिस जमीन पर आज दिल्ली खड़ी है वह कभी गांव की ही जमीन हुआ करती थी लेकिन इस ग्लोब्लाइजेशन के दौर में गांव की जगह कंक्रीट के जंगलों ने ले ली है।
लेकिन गांव आज भी हैं जिन्होंने दिल्ली बसाई आज वो अपनी बदहाली पर खून के आंसू बहा रहे हैं।
महंगे महंगे वाहनों के बोझ तले दबे इस शहर में शुद्ध औक्सीजन तो दिन में लालटेन लेकर भी निकलो तो न मिलेगी। तो सोचा दिल्ली के किसी गांव की सैर करके आते हैं और निकल पड़े दिल्ली के गांव देवली की तरफ।
लेकिन तस्वीर बद से बद्तर निकली। गांव में लोग इस तरह से रह रहे हैं जैसे एक बंद कोठरी में भूसा भर दिया गया हो। देश का जनसंख्या घनत्व कुछ भी हो लेकिन यहां के आंकड़े उस घनत्व से कोई इत्तफाक़ नहीं रखते।
गांव में घुसते ही पीपल का पेड़ दिखा जो २४ घण्टे औक्सीजन मुफ्त में प्रोवाइड कराता है। तो सोचा क्यों न यहीं औक्सीजन की दो सांसें ले लीं जाए। मोटर साइकल को सड़क किनारे लगाते हुए पीपल के नीचे पहुंचा।
वहीं एक पान की दुकान देखी जिससे गांव के हाल चाल लेने की सूझी और सिग्रेट लेने के के बहाने ही उससे बात करने लगा। जैसे जैसे मैंने उससे बात की उसने बताया कि उसका नाम रामफल है और पिछले १७ सालों से परिवार के साथ दिल्ली में ही किराए की अवैध कॉलोनी में रहता है। बीते उन सालों में हर चुनाव में उसने वोट का कर्ज अदा किया लेकिन नहीं पता किसे किया। उसे यह भी नहीं पता कि उसके इलाके का निगम पार्षद और विधायक कौन है। ज्यूं ज्यूं में उससे बात करता लोगों का हुजूम जुड़ने लगा और सभी लोग अपने अपने तरीके से गांव की तस्वीर बयां करने लगे।
कहते हैं बीते दो दशको में सब कुछ बदल गया दिल्ली की इमारतें आसमान छूने लगीं खुली सपाट सड़कें बन गईं फ्लाईओवर दर फ्लाईओवर बन गये दिल्ली मैट्रो भी आ गई और भी कई बड़ी उपलब्धियां दिल्ली के साथ जुड़ गईं।
साथ ही साथ गांव भी बदला लेकिन शहर नहीं बना तो शहर से कम भी नहीं रहा लेकिन लोग उसे देवली गांव के नाम से ही जानते और पुकारते हैं। वहां खड़े लोगों ने मुझे गांव के अंदर तक जाने से मना किया कहा कि भइया सड़क यहीं खत्म हो जाती है इसके आगे तो बड़े बड़े खड्डे हैं। आपको चोट लग सकती है मोटर साइकल को भी नुकसान हो सकता है। कहते हैं अभी सर्दी के दिनों में तो खड्डे नजर आ भी जाते हैं लेकिन बारिश के दिनों में सड़क नाले में तब्दील हो जाती है। गांव के भीतर से जल निकासी का कोई प्रबंध नहीं है पानी पूरे चौमासे यहीं सड़कों पर ही भरा रहता है। जिस पर सिवाय बीमारियों के कुछ और नहीं तैरता। संगम बिहार का भी सारा गंदा पानी देवली गांव की ही तरफ आता है। गांव के लोग तो अब गांव छोड़ शहर चले गये यहां तो बस प्रवासी कामगर मजदूर ही रहते हैं। यहां रहने वाले ज्यादातर लोग मजदूर रेडड़ी लगाने वाले जैसे लोग ही रहते हैं।
यहां के पूर्व निगम पार्षद और वर्तमान दिल्ली प्रदेश के भाजपा कोषाध्य नाम कहते हैं कि स्तिथि बदतर से भी गई गुजरी हो चली है। गांव का आदमी बेवसी और नर्क की ज़िंदगी बसर करने को मजबूर है। लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है।
यहां चोर उचक्कों का राज है गरीब मजदूर मजबूर है। कभी ऐसा भी होता है कि घर आया मेहमान आपसे पानी मांगे और बार बार आप उसके हाथ में कोल्ड ड्रिंक थमा दें। चाय पीने और पिलाने की बात करने लगें। जिल्लत की ज़िंदगी का एहसास तो तब होता है जब मेहमान को हम बिना पानी पिलाए ही घर से रवाना कर देते हैं। रहीम का दोहा
रहिमन पानी राखिये बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरे मोती मानस चून।।
का एहसास किसी हो चाहे न हो लेकिन देवली गांव के निवासियों को जरूर है।
साथ ही साथ कहते हैं कि जब प्रदेश में बीजेपी की सरकार थी तो कॉंग्रेस का विधायक था जब कॉंग्रेस की सरकार थी तो बीजेपी का विधायक था जिस वजह से कभी तालमेल बैठ नहीं पाया।
लेकिन अब जबकि सरकार और बिधायक दोंनों ही कॉंग्रेस के हैं तो सरकार कोई सकारात्मक पहल क्यों नहीं करती। गांव में सड़क नहीं है बिजली नहीं है पीने का शुद्ध पानी नहीं है लोग पानी खरीदकर ही जीवन यापन करते हैं अशुद्ध जल निकासी के लिए नाला नहीं है किसी भी इमरजैंसी की स्तिथि में गांव से निकलने का कोई दूसरा रास्ता तक नहीं है ऐसी कई गम्भीर समस्याओं का ज़िक्र किया।
दिल्ली में एसे ही सेकड़ों गाव हैं जिनकी खैर खबर लेने वाला कोई नहीं। दिल्ली में कुछ भी हो तो टीवी पर सबसे पहले दौड़ने लगता है।
कहीं सड़क धसती है तो सब टीवी चैनल टीआरपी मैराथन में लग जाते हैं लेकिन जहां सड़क ही नहीं वहां की खबर कौन ले शायद ओबी वैन वहां तक न पहुंचती होगी।
एक दिन पानी नहीं आता या कटौती कर दी जाती है टीवी पर दिल्ली के पानी की कमी आ जाती है लेकिन जहां पानी कभी नहीं आता वहां की सुध कोई क्यूं ले पानी खरीद कर खा पी नहा धो तो लेते ही हैं वे लोग।
ऐसा लगता है जैसे आसमान छूती इन इमारतो के बोझ से गांव कहीं दब गया है। जैसे उसकी परछईं में कहीं छुप गया है।
अगर यही हालात रहे तो आज हम सेव टाइगर आंदोलन चला रहे हैं तो कल सेव विलेज आंदोलन चलाएंगे।
वरना गिद्दों की तरह ही कहेंगे कि दिल्ली में गांव थे।
वही बड़े बड़े मॉल्स चिकनी सपाट सड़कें फ्लाईओवर फ्लाईओवर के ऊपर फ्लाईओवर मैट्रो रेल क्नौट प्लेस इंडिया गेट संसद भवन राष्ट्रपति भवन न जाने क्या क्या हमारे सामने मण्डराने लगता है।
लेकिन हम में से कितने लोग हैं जो दिल्ली के गावों को भी जानते हैं
दिल्ली में गांव कैसे हो सकते कुछ लोग तो यह भी सोचते होंगे
जी हां जिस जमीन पर आज दिल्ली खड़ी है वह कभी गांव की ही जमीन हुआ करती थी लेकिन इस ग्लोब्लाइजेशन के दौर में गांव की जगह कंक्रीट के जंगलों ने ले ली है।
लेकिन गांव आज भी हैं जिन्होंने दिल्ली बसाई आज वो अपनी बदहाली पर खून के आंसू बहा रहे हैं।
महंगे महंगे वाहनों के बोझ तले दबे इस शहर में शुद्ध औक्सीजन तो दिन में लालटेन लेकर भी निकलो तो न मिलेगी। तो सोचा दिल्ली के किसी गांव की सैर करके आते हैं और निकल पड़े दिल्ली के गांव देवली की तरफ।
लेकिन तस्वीर बद से बद्तर निकली। गांव में लोग इस तरह से रह रहे हैं जैसे एक बंद कोठरी में भूसा भर दिया गया हो। देश का जनसंख्या घनत्व कुछ भी हो लेकिन यहां के आंकड़े उस घनत्व से कोई इत्तफाक़ नहीं रखते।
गांव में घुसते ही पीपल का पेड़ दिखा जो २४ घण्टे औक्सीजन मुफ्त में प्रोवाइड कराता है। तो सोचा क्यों न यहीं औक्सीजन की दो सांसें ले लीं जाए। मोटर साइकल को सड़क किनारे लगाते हुए पीपल के नीचे पहुंचा।
वहीं एक पान की दुकान देखी जिससे गांव के हाल चाल लेने की सूझी और सिग्रेट लेने के के बहाने ही उससे बात करने लगा। जैसे जैसे मैंने उससे बात की उसने बताया कि उसका नाम रामफल है और पिछले १७ सालों से परिवार के साथ दिल्ली में ही किराए की अवैध कॉलोनी में रहता है। बीते उन सालों में हर चुनाव में उसने वोट का कर्ज अदा किया लेकिन नहीं पता किसे किया। उसे यह भी नहीं पता कि उसके इलाके का निगम पार्षद और विधायक कौन है। ज्यूं ज्यूं में उससे बात करता लोगों का हुजूम जुड़ने लगा और सभी लोग अपने अपने तरीके से गांव की तस्वीर बयां करने लगे।
कहते हैं बीते दो दशको में सब कुछ बदल गया दिल्ली की इमारतें आसमान छूने लगीं खुली सपाट सड़कें बन गईं फ्लाईओवर दर फ्लाईओवर बन गये दिल्ली मैट्रो भी आ गई और भी कई बड़ी उपलब्धियां दिल्ली के साथ जुड़ गईं।
साथ ही साथ गांव भी बदला लेकिन शहर नहीं बना तो शहर से कम भी नहीं रहा लेकिन लोग उसे देवली गांव के नाम से ही जानते और पुकारते हैं। वहां खड़े लोगों ने मुझे गांव के अंदर तक जाने से मना किया कहा कि भइया सड़क यहीं खत्म हो जाती है इसके आगे तो बड़े बड़े खड्डे हैं। आपको चोट लग सकती है मोटर साइकल को भी नुकसान हो सकता है। कहते हैं अभी सर्दी के दिनों में तो खड्डे नजर आ भी जाते हैं लेकिन बारिश के दिनों में सड़क नाले में तब्दील हो जाती है। गांव के भीतर से जल निकासी का कोई प्रबंध नहीं है पानी पूरे चौमासे यहीं सड़कों पर ही भरा रहता है। जिस पर सिवाय बीमारियों के कुछ और नहीं तैरता। संगम बिहार का भी सारा गंदा पानी देवली गांव की ही तरफ आता है। गांव के लोग तो अब गांव छोड़ शहर चले गये यहां तो बस प्रवासी कामगर मजदूर ही रहते हैं। यहां रहने वाले ज्यादातर लोग मजदूर रेडड़ी लगाने वाले जैसे लोग ही रहते हैं।
यहां के पूर्व निगम पार्षद और वर्तमान दिल्ली प्रदेश के भाजपा कोषाध्य नाम कहते हैं कि स्तिथि बदतर से भी गई गुजरी हो चली है। गांव का आदमी बेवसी और नर्क की ज़िंदगी बसर करने को मजबूर है। लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है।
यहां चोर उचक्कों का राज है गरीब मजदूर मजबूर है। कभी ऐसा भी होता है कि घर आया मेहमान आपसे पानी मांगे और बार बार आप उसके हाथ में कोल्ड ड्रिंक थमा दें। चाय पीने और पिलाने की बात करने लगें। जिल्लत की ज़िंदगी का एहसास तो तब होता है जब मेहमान को हम बिना पानी पिलाए ही घर से रवाना कर देते हैं। रहीम का दोहा
रहिमन पानी राखिये बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरे मोती मानस चून।।
का एहसास किसी हो चाहे न हो लेकिन देवली गांव के निवासियों को जरूर है।
साथ ही साथ कहते हैं कि जब प्रदेश में बीजेपी की सरकार थी तो कॉंग्रेस का विधायक था जब कॉंग्रेस की सरकार थी तो बीजेपी का विधायक था जिस वजह से कभी तालमेल बैठ नहीं पाया।
लेकिन अब जबकि सरकार और बिधायक दोंनों ही कॉंग्रेस के हैं तो सरकार कोई सकारात्मक पहल क्यों नहीं करती। गांव में सड़क नहीं है बिजली नहीं है पीने का शुद्ध पानी नहीं है लोग पानी खरीदकर ही जीवन यापन करते हैं अशुद्ध जल निकासी के लिए नाला नहीं है किसी भी इमरजैंसी की स्तिथि में गांव से निकलने का कोई दूसरा रास्ता तक नहीं है ऐसी कई गम्भीर समस्याओं का ज़िक्र किया।
दिल्ली में एसे ही सेकड़ों गाव हैं जिनकी खैर खबर लेने वाला कोई नहीं। दिल्ली में कुछ भी हो तो टीवी पर सबसे पहले दौड़ने लगता है।
कहीं सड़क धसती है तो सब टीवी चैनल टीआरपी मैराथन में लग जाते हैं लेकिन जहां सड़क ही नहीं वहां की खबर कौन ले शायद ओबी वैन वहां तक न पहुंचती होगी।
एक दिन पानी नहीं आता या कटौती कर दी जाती है टीवी पर दिल्ली के पानी की कमी आ जाती है लेकिन जहां पानी कभी नहीं आता वहां की सुध कोई क्यूं ले पानी खरीद कर खा पी नहा धो तो लेते ही हैं वे लोग।
ऐसा लगता है जैसे आसमान छूती इन इमारतो के बोझ से गांव कहीं दब गया है। जैसे उसकी परछईं में कहीं छुप गया है।
अगर यही हालात रहे तो आज हम सेव टाइगर आंदोलन चला रहे हैं तो कल सेव विलेज आंदोलन चलाएंगे।
वरना गिद्दों की तरह ही कहेंगे कि दिल्ली में गांव थे।
Friday, October 15, 2010
cwg जांच के मायने
आखिरकार राष्ट्रमण्डल खेल सफलता एवं शान्तिपूर्वक सम्पन्न हो गये। ओपनिंग और क्लोजिंग सेरेमनी में रंगारंग भारतीय संस्कृति और परम्परा के अनुरूप कार्यक्रम पेश किये गये, जिसने विश्व भर के करोड़ों दर्शकों का मन मोह लिया, भारतीय सभ्यता को इक अलग नई पहचान मिली और दुनिया ने जाना। इंटरपोल ने भारतीय सुरक्षा इजेंसियों की तारीफ की, OC चेयरमेन फेनेल ने भी आयोजन और व्यवस्थाओं की तारीफ की, विदेशी इथलीटों ने भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर की सुविधाओं का भरपूर आनंद लिया और समापन के साथ ही अपने देशों को रवाना हो गए।
लेकिन इन सब के बावजूद एक सवाल यह उठता है कि 3 अक्टूबर से पहले जो पैसे के बंदरबांट और लूटखसोटी का मामला सामने आया था, और जिन्हें इन खेलों के आयोजन का जिम्मा सौंपा गया था क्या उन पर भारत सरकार और न्याय पालिका उचित कदम उठा पाएंगे, उन दोषियों पर कार्यवाही करेंगे जिन्होने भारत की छवि को धूमिल किया था?
मीडिया के मुताबिक खेलों में तकरीबन एक लाख करोड़ रुपये खर्च किए गये हैं। जो कि विश्व भर में किसी खेल आयोजन में खर्च की गई अब तक की सबसे बड़ी धन राशि है। 2003 में जब भारत को इन खेलों की मेज़बानी सौंपी गई थी तब यह बजट मात्र 767 करोड़ रुपये था जो बाद में चलकर एक लाख करोड़ तक पहुंचा। एक नज़र डाल लेते हैं 767 करोड़ से 1,00,000 करोड़ के इस लम्बे सफर पर।
वर्ष सरकार बजट अनुमानित कमाई
2003 NDA 767 cr 1000 cr
2005 UPA 1260 cr
2008 UPA 11494 cr 15000 cr
2009 UPA 21700 cr 35000 cr
2010 UPA 27894 cr 40000 cr
2010 UPA 44000 cr 1,00,000 cr
2010 UPA 1,00,000 cr 4-5 lakh cr
जिस तरीके से इस बजट ने तरक्की की उसी तरीके से भ्रष्टाचार की बू भी बढ़ने लगी। और भारत का यह अब तक का सबसे बड़ा घोटाला माना जा रहा है।
केंद्रीय मंत्री एवं कांग्रेस सांसद अय्यर ने कहा, “प्रधानमंत्री ने कहा है कि खेल ख़त्म होते ही जो ग़लतियां हुईं हैं...जो ख़ामियां रहीं हैं, उनकी जांच की जाएगी और यदि किसी किस्म का भ्रष्टाचार हुआ होगा तो उसको सामने लाएंगे और सख़्त दंड दिया जाएगा. मैं उम्मीद रखता हूं कि अब जबकि ये सर्कस ख़त्म हो चुका है जांच शुरू की जानी चाहिए।
सवाल यह है कि न्याय पालिका आम जनता के टैक्स के पैसे के दुर्पुयोग के दोषियों को सजा दे पाएगा?
और क्या इन दोषियों पर कार्यवाही करने का मतलब धूल में लाठी चलाने जैसा है?
पहले से ही हजारों केस कतार में हैं, कहीं इन पर भी कार्यवाही करना समय और की धन की बर्बादी तो नहीं?
लेकिन इन सब के बावजूद एक सवाल यह उठता है कि 3 अक्टूबर से पहले जो पैसे के बंदरबांट और लूटखसोटी का मामला सामने आया था, और जिन्हें इन खेलों के आयोजन का जिम्मा सौंपा गया था क्या उन पर भारत सरकार और न्याय पालिका उचित कदम उठा पाएंगे, उन दोषियों पर कार्यवाही करेंगे जिन्होने भारत की छवि को धूमिल किया था?
मीडिया के मुताबिक खेलों में तकरीबन एक लाख करोड़ रुपये खर्च किए गये हैं। जो कि विश्व भर में किसी खेल आयोजन में खर्च की गई अब तक की सबसे बड़ी धन राशि है। 2003 में जब भारत को इन खेलों की मेज़बानी सौंपी गई थी तब यह बजट मात्र 767 करोड़ रुपये था जो बाद में चलकर एक लाख करोड़ तक पहुंचा। एक नज़र डाल लेते हैं 767 करोड़ से 1,00,000 करोड़ के इस लम्बे सफर पर।
वर्ष सरकार बजट अनुमानित कमाई
2003 NDA 767 cr 1000 cr
2005 UPA 1260 cr
2008 UPA 11494 cr 15000 cr
2009 UPA 21700 cr 35000 cr
2010 UPA 27894 cr 40000 cr
2010 UPA 44000 cr 1,00,000 cr
2010 UPA 1,00,000 cr 4-5 lakh cr
जिस तरीके से इस बजट ने तरक्की की उसी तरीके से भ्रष्टाचार की बू भी बढ़ने लगी। और भारत का यह अब तक का सबसे बड़ा घोटाला माना जा रहा है।
केंद्रीय मंत्री एवं कांग्रेस सांसद अय्यर ने कहा, “प्रधानमंत्री ने कहा है कि खेल ख़त्म होते ही जो ग़लतियां हुईं हैं...जो ख़ामियां रहीं हैं, उनकी जांच की जाएगी और यदि किसी किस्म का भ्रष्टाचार हुआ होगा तो उसको सामने लाएंगे और सख़्त दंड दिया जाएगा. मैं उम्मीद रखता हूं कि अब जबकि ये सर्कस ख़त्म हो चुका है जांच शुरू की जानी चाहिए।
सवाल यह है कि न्याय पालिका आम जनता के टैक्स के पैसे के दुर्पुयोग के दोषियों को सजा दे पाएगा?
और क्या इन दोषियों पर कार्यवाही करने का मतलब धूल में लाठी चलाने जैसा है?
पहले से ही हजारों केस कतार में हैं, कहीं इन पर भी कार्यवाही करना समय और की धन की बर्बादी तो नहीं?
Tuesday, July 20, 2010
Saturday, July 17, 2010
Thursday, July 15, 2010
महंगाई
सखी सईयां तो खूब ही कमात हैं, महंगाई डायन खाय जात है।
जी हां ये गाना आमिर खान की अगली फिल्म पिपली लाइव से है।
ये गाना फिल्मी कम एक आम आदमी का दर्द बयां करता ज्यादा लगता है।
फिल्म रिलीज़ से पहले ही खुब सुर्खियां बटोर रही है,यहां तक कि विपक्षी दल या कहैं समुचा विपक्ष इस गाने के कॉपी राइट अधिकार खरीदकर कॉंग्रेस के खिलाफ चुनावी हथियार के तौर पर इस्तैमाल करने की जुगत लगा रहे हैं। ये तो इस गाने को गली गली, नुक्कड़ नुक्कड़, गांव गांव में बजाना चाहते हैं। ऐसे गाने भारतीय हिंदी फिल्मोद्दोग कम नजर आते हैं, पर
यकीन जानिए यह गाना सरकार की नाक में दम कर सकता है। ये बात अलग है कि आमिर ने अभी तक अधिकार बेचे नहीं हैं।
यह फिल्म आम आदमी जो महंगाई की मार झेल रहा है और दिन प्रतिदिन आत्महत्या कर रहे किसानों पर जरूर आधारित है, लेकिन इसका प्रीमियर ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में होगा जिसमें लाखों करोड़ों का लम्बा खर्च होगा। बताइए महंगाई और भुखमरी की मार झेल रहे किसानों का दर्द बयां करती फिल्म इतने खर्चने के बाद पर्दे पर आएगी। फिल्म चलेगी भी करोड़ों कमाएगी भी, दो चार दिन महीने प्रशंसा भी मिलेगी, आमिर और उनकी टीम को अवार्डों से नवाज़ा भी जाएगा। कहानी खत्म.......
आम आदमी और किसान का दर्द वहीं का वहीं कोई बदलाव नहीं, पीठ और पेट एक हो चले हैं। आस के सिवाय और कोई चारा भी नहीं है।
जी हां ये गाना आमिर खान की अगली फिल्म पिपली लाइव से है।
ये गाना फिल्मी कम एक आम आदमी का दर्द बयां करता ज्यादा लगता है।
फिल्म रिलीज़ से पहले ही खुब सुर्खियां बटोर रही है,यहां तक कि विपक्षी दल या कहैं समुचा विपक्ष इस गाने के कॉपी राइट अधिकार खरीदकर कॉंग्रेस के खिलाफ चुनावी हथियार के तौर पर इस्तैमाल करने की जुगत लगा रहे हैं। ये तो इस गाने को गली गली, नुक्कड़ नुक्कड़, गांव गांव में बजाना चाहते हैं। ऐसे गाने भारतीय हिंदी फिल्मोद्दोग कम नजर आते हैं, पर
यकीन जानिए यह गाना सरकार की नाक में दम कर सकता है। ये बात अलग है कि आमिर ने अभी तक अधिकार बेचे नहीं हैं।
यह फिल्म आम आदमी जो महंगाई की मार झेल रहा है और दिन प्रतिदिन आत्महत्या कर रहे किसानों पर जरूर आधारित है, लेकिन इसका प्रीमियर ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में होगा जिसमें लाखों करोड़ों का लम्बा खर्च होगा। बताइए महंगाई और भुखमरी की मार झेल रहे किसानों का दर्द बयां करती फिल्म इतने खर्चने के बाद पर्दे पर आएगी। फिल्म चलेगी भी करोड़ों कमाएगी भी, दो चार दिन महीने प्रशंसा भी मिलेगी, आमिर और उनकी टीम को अवार्डों से नवाज़ा भी जाएगा। कहानी खत्म.......
आम आदमी और किसान का दर्द वहीं का वहीं कोई बदलाव नहीं, पीठ और पेट एक हो चले हैं। आस के सिवाय और कोई चारा भी नहीं है।
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